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तुम उसको बुरे नाम से!
तुम उस को बुरे नाम से यारो न पुकारो, ये नाम उसे बाइस-ए-आज़ार* ही कब था| *Cause Of Trouble क़तील शिफ़ाई
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वो बेज़ार ही कब था!
आवाज़ जो मैं दूँ तो किसी और को छू ले, इस आँख-मिचोली से वो बेज़ार ही कब था| क़तील शिफ़ाई
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ये किरदार ही कब था!
आमों की हसीं रुत के सिवा भी तो वो कूके, लेकिन किसी कोयल का ये किरदार ही कब था| क़तील शिफ़ाई
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पीताभ किरण पंछी!
आज से मैं, अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करना प्रारंभ कर रहा हूँ और इस क्रम में सबसे पहले मैं स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…
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वो चाँद-सितारों का!
उस ने तो सदा पूजे हैं उड़ते हुए जुगनू, वो चाँद-सितारों का परस्तार ही कब था| क़तील शिफ़ाई
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वफ़ादार ही कब था!
क्या इस का गिला कीजे उसे प्यार ही कब था, वो अहद-ए-फ़रामोश वफ़ादार ही कब था| क़तील शिफ़ाई
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मदहोशी में एहसास के
मद-होशी में एहसास के ऊँचे ज़ीने से गिर जाने दे, इस वक़्त न मुझ को थाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| क़तील शिफ़ाई
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वक़्त नहीं है बातों का!
ये वक़्त नहीं है बातों का पलकों के साए काम में ला, इल्हाम कोई इल्हाम* कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| *ईश्वरीय प्रेरणा क़तील शिफ़ाई