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रात गहरे अज़ाब जैसी!
वो दिन था दोज़ख़ की आग जैसा, वो रात गहरे अज़ाब* जैसी| *Punishment मुनीर नियाज़ी
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फागुन की शाम!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| भारती जी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘धर्मयुग’ के संपादक के रूप में भी विख्यात हुए थे| भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|…
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शब भर बे-आराम हुए!
‘इंशा’-साहिब पौ फटती है तारे डूबे सुब्ह हुई, बात तुम्हारी मान के हम तो शब भर बे-आराम हुए| इब्न-ए-इंशा
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जी को दुखाना क्या!
उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या, जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए| इब्न-ए-इंशा
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घटते घटते सर्द न हो!
शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो, चाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए| इब्न-ए-इंशा
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एक हमीं हुशियार थे!
एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है, एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए| इब्न-ए-इंशा