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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Mar 2024

    रूह बदन का बोझ!

    उम्र-सफ़र जारी है बस ये खेल देखने को, रूह बदन का बोझ कहाँ तक कब तक ढोती है|    शहरयार

  • 2nd Mar 2024

    ख़ुद को तसल्ली देना!

    ख़ुद को तसल्ली देना कितना मुश्किल होता है, कोई क़ीमती चीज़ अचानक जब भी खोती है| शहरयार

  • 2nd Mar 2024

    नींदें बोती है!

    ख़्वाब देखने की हसरत में तन्हाई मेरी, आँखों की बंजर धरती में नींदें बोती है| शहरयार

  • 2nd Mar 2024

    एक भावना!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के   क्रम में आज स्वर्गीय हरिनारायण व्यास जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| हरिनारायण जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिनारायण व्यास जी की यह कविता – इस पुरानी जिन्दगी की जेल…

  • 1st Mar 2024

    यादों के सैलाब में

    यादों के सैलाब में जिस दम मैं घिर जाता हूँ, दिल-दीवार उधर जाने की ख़्वाहिश होती है| शहरयार

  • 1st Mar 2024

    लम्बी रात में होती है!

    जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है, कितनी वहशत हिज्र की लम्बी रात में होती है| शहरयार

  • 1st Mar 2024

    छोड़ आया पीछे!

    कितना आसाँ लग रहा है मुझ को आगे का सफ़र, छोड़ आया पीछे परछाईं को डरने के लिए| शहरयार

  • 1st Mar 2024

    सैर करने के लिए!

    ये जगह हैरत-सराए है कहाँ थी ये ख़बर, यूँही आ निकला था मैं तो सैर करने के लिए| शहरयार

  • 1st Mar 2024

    रंग क्या कोई बचा है!

    अब ज़मीं क्यूँ तेरे नक़्शे से नहीं हटती नज़र, रंग क्या कोई बचा है इस में भरने के लिए| शहरयार

  • 1st Mar 2024

    चाँद से जब भी कहा!

    इस बुलंदी ख़ौफ़ से आज़ाद हो उस ने कहा, चाँद से जब भी कहा नीचे उतरने के लिए| शहरयार

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