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ख़ुद को तसल्ली देना!
ख़ुद को तसल्ली देना कितना मुश्किल होता है, कोई क़ीमती चीज़ अचानक जब भी खोती है| शहरयार
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एक भावना!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज स्वर्गीय हरिनारायण व्यास जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| हरिनारायण जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिनारायण व्यास जी की यह कविता – इस पुरानी जिन्दगी की जेल…
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यादों के सैलाब में
यादों के सैलाब में जिस दम मैं घिर जाता हूँ, दिल-दीवार उधर जाने की ख़्वाहिश होती है| शहरयार
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लम्बी रात में होती है!
जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है, कितनी वहशत हिज्र की लम्बी रात में होती है| शहरयार
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सैर करने के लिए!
ये जगह हैरत-सराए है कहाँ थी ये ख़बर, यूँही आ निकला था मैं तो सैर करने के लिए| शहरयार
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रंग क्या कोई बचा है!
अब ज़मीं क्यूँ तेरे नक़्शे से नहीं हटती नज़र, रंग क्या कोई बचा है इस में भरने के लिए| शहरयार
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चाँद से जब भी कहा!
इस बुलंदी ख़ौफ़ से आज़ाद हो उस ने कहा, चाँद से जब भी कहा नीचे उतरने के लिए| शहरयार