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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Sep 2024

    गुलज़ार हर वीराना!

    ख़ून-ए-दिल से चश्म-ए-तर तक चश्म-ए-तर से ता-ब-ख़ाक,कर गए आख़िर गुल-ओ-गुलज़ार हर वीराना हम| अली सरदार जाफ़री

  • 15th Sep 2024

    जिसके सम्मोहन में पाग़ल!

    आज एक बार फिर मैं जनकवि स्वर्गीय अदम गोंडवी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अदम गोंडवी जी की यह ग़ज़ल – जिसके सम्मोहन में पाग़ल, धरती है, आकाश भी है ।एक पहेली-सी ये दुनिया, गल्प भी है, इतिहास…

  • 14th Sep 2024

    गर्दिश-ए-पैमाना हम!

    मस्ती-ए-रिंदाना हम सैराबी-ए-मय-ख़ाना हम,गर्दिश-ए-तक़दीर से हैं गर्दिश-ए-पैमाना हम| अली सरदार जाफ़री

  • 14th Sep 2024

    हर गली आज तिरी!

    लखनऊ क्या तिरी गलियों का मुक़द्दर था यही,हर गली आज तिरी ख़ाक-बसर लगती है| जाँ निसार अख़्तर

  • 14th Sep 2024

    अख़बार के दफ़्तर!

    वाक़िआ शहर में कल तो कोई ऐसा न हुआ,ये तो अख़बार के दफ़्तर की ख़बर लगती है| जाँ निसार अख़्तर

  • 14th Sep 2024

    ये सदी दुश्मन-ए!

    कोई आसूदा नहीं अहल-ए-सियासत के सिवा,ये सदी दुश्मन-ए-अरबाब-ए-हुनर लगती है| जाँ निसार अख़्त

  • 14th Sep 2024

    ख़ून से तर लगती है!

    सारी दुनिया में ग़रीबों का लहू बहता है,हर ज़मीं मुझ को मिरे ख़ून से तर लगती है| जाँ निसार अख़्तर

  • 14th Sep 2024

    आग किधर लगती है!

    जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं,देखना ये है कि अब आग किधर लगती है| जाँ निसार अख़्तर

  • 14th Sep 2024

    ख़ुशबू का सफ़र!

    लम्हे लम्हे में बसी है तिरी यादों की महक,आज की रात तो ख़ुशबू का सफ़र लगती है| जाँ निसार अख़्तर

  • 14th Sep 2024

    नदी!

    आज एक बार फिर मैं नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – एक मीनार उठती रही एक मीनार ढहती रही अनरुकी अनथकी सामने यह नदी किन्तु…

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