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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Sep 2024

    साहू ने गिरवी रख ली!

    तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी,साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की| गुलज़ार

  • 12th Sep 2024

    रेत कभी तन्हाई की!

    आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं,क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की| गुलज़ार

  • 12th Sep 2024

    दिल की आहट!

    सीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चले,हर साए का पीछा करना आदत है हरजाई की| गुलज़ार

  • 12th Sep 2024

    काल-कुएँ में गूँजती!

    नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है,काल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की| गुलज़ार

  • 12th Sep 2024

    तिनका तिनका काँटे!

    तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की,क्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई की| गुलज़ार

  • 12th Sep 2024

    सुंदरियो!

    आज एक बार फिर मैं विख्यात आंचलिक उपन्यास एवं कहानी लेखक और कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रेणु जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता  –  सुंदरियो-यो-योहो-होअपनी-अपनी छातियों परदुद्धी फूल के झुके…

  • 11th Sep 2024

    कितना जुर्माना मैं भरूँ!

    कुछ रिवायात की गवाही पर,कितना जुर्माना मैं भरूँ साहब| जावेद अख़्तर

  • 11th Sep 2024

    अब झुकूँगा तो!

    अब झुकूँगा तो टूट जाऊँगा,कैसे अब और मैं झुकूं साहब| जावेद अख़्तर

  • 11th Sep 2024

    शाम भी ढल रही है!

    शाम भी ढल रही है घर भी है दूर,कितनी देर और मैं रुकूँ साहब| जावेद अख़्तर

  • 11th Sep 2024

    दो-घड़ी मिलता जो!

    हम तुम्हें याद करते रो लेते,दो-घड़ी मिलता जो सुकूँ साहब| जावेद अख़्तर

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