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तुम्हीं हो क्या बन्धु वह!
आज मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार तथा तारसप्तक और अन्य सप्तकों के माध्यम से अनेक कवियों को बड़े आधार पर सामने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय…
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देख चुका हूँ पहले भी!
गो देख चुका हूँ पहले भी नज़्ज़ारा दरिया-नोशी* का, एक और सला-ए-आम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| *OverDrinking क़तील शिफ़ाई
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देख सितारों के मोती!
वो देख सितारों के मोती हर आन बिखरते जाते हैं, अफ़्लाक* पे है कोहराम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| *Sky क़तील शिफ़ाई
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रात गुज़रने वाली है!
इक जाम खनकता जाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है, इक होश-रुबा इनआ‘म कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| क़तील शिफ़ाई
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पागल नहीं होते!
उश्शाक़* के मानिंद कई अहल-ए-हवस भी, पागल तो नज़र आते हैं पागल नहीं होते| *आशिक़ अहमद फ़राज़
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ओझल नहीं होते!
कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम-ए-जाँ में, कुछ याद-जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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जल-थल नहीं होते!
शाइस्तगी-ए-ग़म* के सबब आँखों के सहरा, नमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते| *दुख सहने की सुशीलता अहमद फ़राज़
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चाँदनी!
आज मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार तथा अज्ञेय जी द्वारा संपादित प्रमुख काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में भी शामिल कवि स्वर्गीय राम विलास शर्मा जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राम विलास शर्मा जी की यह कविता – चांदी की झीनी…
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कुछ मुश्किलें ऐसी हैं!
कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं, कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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करिश्मे भी अजब हैं!
अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं, मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते| अहमद फ़राज़