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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Mar 2024

    रिश्तों की पैमाइश पर!

    फ़ासले हैं भी और नहीं भी नापा तौला कुछ भी नहीं, लोग ब-ज़िद रहते हैं फिर भी रिश्तों की पैमाइश पर| गुलज़ार

  • 5th Mar 2024

    सैली सी ख़ामोशी में!

    ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर, सैली सी ख़ामोशी में आवाज़ सुनी फ़रमाइश पर| गुलज़ार

  • 5th Mar 2024

    लक्ष्य वेध!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय प्रयाग नारायण त्रिपाठी जी की  एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी  रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रयाग नारायण त्रिपाठी जी की यह कविता – आँखें लीं मींचऔर खींच ली…

  • 4th Mar 2024

    आवाज़ भी दोहराते हुए

    सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुनकर, मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए| गुलज़ार

  • 4th Mar 2024

    आवाज़ ही दे लेते!

    हसरतें अपनी बिलखतीं न यतीमों की तरह, हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए| गुलज़ार

  • 4th Mar 2024

    शोख़ पत्ते ने कहा!

    मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी, शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए| गुलज़ार

  • 4th Mar 2024

    हम ने तो रात को!

    हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा, छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए| गुलज़ार

  • 4th Mar 2024

    कुछ भँवर डूब गए!

    तुझको देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए, कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए| गुलज़ार

  • 4th Mar 2024

    हम सा कोई आवारा!

    सहरा में बगूला भी है ‘मजरूह’ सबा भी, हम सा कोई आवारा-ए-आलम तो नहीं है|   मजरूह सुल्तानपुरी

  • 4th Mar 2024

    मैंने अपना दिन बिताया- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

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