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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Sep 2024

    क़यामत यक़ीनन क़रीब!

    क़यामत यक़ीनन क़रीब आ गई है‘ख़ुमार’ अब तो मस्जिद में जाने लगे हैं ख़ुमार बाराबंकवी

  • 19th Sep 2024

    अब ऐसे भी तूफ़ान !

    हवाएँ चलीं और न मौजें ही उट्ठींअब ऐसे भी तूफ़ान आने लगे हैं ख़ुमार बाराबंकवी

  • 19th Sep 2024

    ये कहने में मुझ को!

    ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ कोये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं ख़ुमार बाराबंकवी

  • 19th Sep 2024

    वो पत्थर मिरे घर में!

    हटाए थे जो राह से दोस्तों कीवो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं ख़ुमार बाराबंकवी

  • 19th Sep 2024

    तो क्या हम उन्हें!

    सुना है हमें वो भुलाने लगे हैंतो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं ख़ुमार बाराबंकवी

  • 19th Sep 2024

    अब ठिकाने लगे हैं!

    वो हैं पास और याद आने लगे हैंमोहब्बत के होश अब ठिकाने लगे हैं ख़ुमार बाराबंकवी

  • 19th Sep 2024

    मुझे याद आने लगे हैं!

    वही फिर मुझे याद आने लगे हैंजिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं ख़ुमार बाराबंकवी

  • 19th Sep 2024

    हिस्सा!

    आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि श्री नरेश सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| | इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश सक्सेना जी की यह कविता –  बह रहे पसीने में जो पानी है वह सूख जाएगालेकिन उसमें कुछ नमक भी हैजो…

  • 18th Sep 2024

    टूट जाते हैं कभी!

    आबगीनों की तरह दिल हैं ग़रीबों के ‘शमीम’,टूट जाते हैं कभी तोड़ दिए जाते हैं| शमीम जयपुरी

  • 18th Sep 2024

    हँस के हर साँस पे!

    अपनी तारीख़-ए-मोहब्बत के वही हैं सुक़रात,हँस के हर साँस पे जो ज़हर पिए जाते हैं| शमीम जयपुरी

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