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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Sep 2024

    कहीं हवा ही न हो!

    सफ़र में है जो अज़ल से ये वो बला ही न हो,किवाड़ खोल के देखो कहीं हवा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 4th Sep 2024

    दुनिया को कुछ तो!

    गुम हो चले हो तुम तो बहुत ख़ुद में ऐ ‘मुनीर’,दुनिया को कुछ तो अपना पता देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी

  • 4th Sep 2024

    डरा देना चाहिए!

    इक तेज़ रअ’द* जैसी सदा हर मकान में,लोगों को उन के घर में डरा देना चाहिए| *बादलों की गरज मुनीर नियाज़ी

  • 4th Sep 2024

    इक हश्र उस ज़मीं पे!

    मिलती नहीं पनाह हमें जिस ज़मीन पर,इक हश्र उस ज़मीं पे उठा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी

  • 4th Sep 2024

    फिर उसकी ख़ाक!

    इस शहर-ए-संग-दिल को जला देना चाहिए,फिर उस की ख़ाक को भी उड़ा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी

  • 4th Sep 2024

    क्या!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात आधुनिक कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता  शेयर कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| अनेक आधुनिक कवियों को आगे बढ़ाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह…

  • 3rd Sep 2024

    अर्श पे तारे कहलाए!

    कुछ वो जिन्हें हम से निस्बत थी उन कूचों में आन आबाद हुए,कुछ अर्श पे तारे कहलाए कुछ फूल बने जा गुलशन में| इब्न-ए-इंशा

  • 3rd Sep 2024

    उस हुस्न के नाम पे!

    उस हुस्न के नाम पे याद आए सब मंज़र ‘फ़ैज़’ की नज़्मों के,वही रंग-ए-हिना वही बंद-ए-क़बा वही फूल खिले पैराहन में| इब्न-ए-इंशा

  • 3rd Sep 2024

    दर्द से दी है सदा!

    अब रह-रव-ए-माँदा से कुछ न कहो हाँ शाद रहो आबाद रहो,बड़ी देर से याद किया तुम ने बड़ी दर्द से दी है सदा तुम ने| इब्न-ए-इंशा

  • 3rd Sep 2024

    बाग़ में ख़ुश ख़ुश बैठे!

    किन राहों से हो कर आई हो किस गुल का संदेसा लाई हो,हम बाग़ में ख़ुश ख़ुश बैठे थे क्या कर दिया आ के सबा तुम ने| इब्न-ए-इंशा

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