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ख़्वाब आते ही कहाँ!
छोड़ जाते हैं हक़ीक़त के जहाँ में हमें फिर, ख़्वाब आते ही कहाँ हमें कभी ताबीर के साथ| राजेश रेड्डी
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मिरी तामीर के साथ
मिरे होने में न होने का था सामाँ मौजूद, टूटना मेरा लिखा था मिरी तामीर के साथ| राजेश रेड्डी
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मिरी तदबीर के साथ!
है कोई बैर सा उस को मिरी तदबीर के साथ, अब कहाँ तक कोई झगड़ा करे तक़दीर के साथ| राजेश रेड्डी
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पता नहीं…!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार, बिल्कुल अलग किस्म की कविताएं लिखने वाले कवि, जिनको अज्ञेय जी द्वारा संपादित प्रमुख काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में भी शामिल किया गया था, ऐसे स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|…
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मुहय्या क्यों करें हम!
चबा लें क्यों न ख़ुद ही अपना ढाँचा, तुम्हें रातिब मुहय्या क्यों करें हम| जौन एलिया
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पर्दा क्यों करें हम!
बरहना* हैं सर-ए-बाज़ार तो क्या, भला अंधों से पर्दा क्यों करें हम| *Naked जौन एलिया
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दुनिया की पर्वा क्यूँ!
नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी, तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँ करें हम| जौन एलिया
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इकट्ठा क्यों करें हम!
जो इक नस्ल-ए-फ़रोमाया* को पहुँचे, वो सरमाया इकट्ठा क्यों करें हम| *Mean जौन एलिया
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क्यों न फेंकें सारी चीज़ें
उठा कर क्यों न फेंकें सारी चीज़ें, फ़क़त कमरों में टहला क्यों करें हम| जौन एलिया