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नहीं मिला उसे भूल जा
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा, वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा| अमजद इस्लाम अमजद
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इतना अंधेरा कैसे!
ज़ुल्फ़ें चेहरे से हटा लो कि हटा दूँ मैं ख़ुद, ‘नूर’ के होते हुए इतना अंधेरा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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लिखूँ तेरा सरापा कैसे!
आँख जिस जा पे भी पड़ती है ठहर जाती है, लिखना चाहूँ तो लिखूँ तेरा सरापा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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तेरी राहों में मिरे!
इस जनम में तो कभी मैं न उधर से गुज़रा, तेरी राहों में मिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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बज़्म में तन्हा कैसे!
आप भी अहल-ए-ख़िरद* अहल-ए-जुनूँ** थे मौजूद, लुट गए हम भी तिरी बज़्म में तन्हा कैसे| *बुद्धिमत्ता, **जोश कृष्ण बिहारी नूर
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खा गए धोका कैसे!
देखी होंटों की हँसी ज़ख़्म न देखे दिल के, आप दुनिया की तरफ़ खा गए धोका कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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इसी तट पर!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी नवगीत की वरिष्ठ कवियित्री सुश्री शांति सुमन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री शांति सुमन जी की यह कविता – अपरिचय का आकाश तोड़ेंएक लंबा अतराल जोड़ें कहाँ बहुत मिलते हैं, फुरसत…
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दोस्तों शुक्र करो!
दोस्तों शुक्र करो मुझ से मुलाक़ात हुई, ये न पूछो कि लुटी है मिरी दुनिया कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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ग़ैरों पे भरोसा कैसे!
मुझ को ख़ुद पर भी भरोसा नहीं होने पाता, लोग कर लेते हैं ग़ैरों पे भरोसा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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मुड़ के मेरी ही तरफ़!
मुझ से जब तर्क-ए-तअल्लुक़ का किया अहद तो फिर, मुड़ के मेरी ही तरफ़ आप ने देखा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर