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विपथगा / हुंकार!
आज एक बार फिर से मैं राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक ओज भरी कविता शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी ने जहां राष्ट्रप्रेम तथा ओज से भरी कविताएं लिखी हैं वहीं ‘उर्वशी’ जैसी एकदम अलग तरह की रचनाएं भी लिखी हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की यह…
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उनका कोई पता नहीं!
इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं, उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उनका कोई पता नहीं| बशीर बद्र
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मैंने चाहा मिला नहीं!
ये ख़ुदा की देन अजीब है कि इसी का नाम नसीब है, जिसे तूने चाहा वो मिल गया जिसे मैंने चाहा मिला नहीं| बशीर बद्र
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इबादतों में शुमार है!
उसे पाक नज़रों से चूमना भी इबादतों में शुमार है, कोई फूल लाख क़रीब हो कभी मैंने उसको छुआ नहीं| बशीर बद्र