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गए दिनों को बुला रहा
शिकस्ता-पा राह में खड़ा हूँ गए दिनों को बुला रहा हूँ, जो क़ाफ़िला मेरा हम-सफ़र था मिसाल-ए-गर्द-ए-सफ़र गया वो| नासिर काज़मी
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झूम रहीं बालियां!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अशोक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – रे देखो खेतों में झूम…
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ठहर गया वो!
बस एक मंज़िल है बुल-हवस की हज़ार रस्ते हैं अहल-ए-दिल के, यही तो है फ़र्क़ मुझ में उस में गुज़र गया मैं ठहर गया वो| नासिर काज़मी
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सँभलने लगी है जाँ भी!
कुछ अब सँभलने लगी है जाँ भी बदल चला दौर-ए-आसमाँ भी, जो रात भारी थी टल गई है जो दिन कड़ा था गुज़र गया वो| नासिर काज़मी
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जो ज़ख़्म गहरा था!
न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा, यूँही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो| नासिर काज़मी
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दिल में उतर गया वो!
ख़ुशी की रुत हो कि ग़म का मौसम नज़र उसे ढूँडती है हर दम, वो बू-ए-गुल था कि नग़्मा-ए-जाँ मिरे तो दिल में उतर गया वो| नासिर काज़मी
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हैरान कर गया वो!
गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो, अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो| नासिर काज़मी
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आज तुम से मिल सकूँगा, था मुझे विश्वास!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना श्रेष्ठ योगदान करने वाले कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की एक प्रमुख उपलब्धि यह भी थी कि उन्होंने उस समय के श्रेष्ठ कवियों को तारसप्तक तथा तीन सप्तकों के माध्यम से…