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ग़ैरों पे भरोसा कैसे!
मुझ को ख़ुद पर भी भरोसा नहीं होने पाता, लोग कर लेते हैं ग़ैरों पे भरोसा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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मुड़ के मेरी ही तरफ़!
मुझ से जब तर्क-ए-तअल्लुक़ का किया अहद तो फिर, मुड़ के मेरी ही तरफ़ आप ने देखा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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ख़ुद से मैं तन्हा कैसे!
हर घड़ी तेरे ख़यालों में घिरा रहता हूँ, मिलना चाहूँ तो मिलूँ ख़ुद से मैं तन्हा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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तेज़ था ठहरा कैसे!
रुक गया आँख से बहता हुआ दरिया कैसे, ग़म का तूफ़ाँ तो बहुत तेज़ था ठहरा कैसे| कृष्ण बिहारी नूर
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उसकी खिड़की खुली है!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के प्रसिद्ध आधुनिक कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – उसकी खिड़की खुली है,उसके आँगन में गूँज रहा…
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जाने किधर गया वो!
वो रात का बे-नवा मुसाफ़िर वो तेरा शाइर वो तेरा ‘नासिर’, तिरी गली तक तो हम ने देखा था फिर न जाने किधर गया वो| नासिर काज़मी
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सर झुकाए गुज़र गया
वो जिस के शाने पे हाथ रख कर सफ़र किया तू ने मंज़िलों का, तिरी गली से न जाने क्यूँ आज सर झुकाए गुज़र गया वो| नासिर काज़मी
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कल रात मर गया वो!
वो हिज्र की रात का सितारा वो हम-नफ़स हम-सुख़न हमारा, सदा रहे उस का नाम प्यारा सुना है कल रात मर गया वो| नासिर काज़मी
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क्यूँ बे-असर गया वो!
मिरा तू ख़ूँ हो गया है पानी सितमगरों की पलक न भीगी, जो नाला उट्ठा था रात दिल से न जाने क्यूँ बे-असर गया वो| नासिर काज़मी