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ख़ता है कि नहीं है!
सच है कि मोहब्बत में हमें मौत ने मारा, कुछ इसमें तुम्हारी भी ख़ता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली
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जाने तिरे क़दमों की!
सुनता हूँ इक आहट सी बराबर शब-ए-वादा, जाने तिरे क़दमों की सदा है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली
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दवा है कि नहीं है!
बीमार-ए-मोहब्बत की दवा है कि नहीं है, मेरे किसी पहलू में क़ज़ा* है कि नहीं है| *Death, Luck कैफ़ भोपाली
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दर्द-ए-सर गया!
इस दिल के टूटने का मुझे कोई ग़म नहीं, अच्छा हुआ कि पाप कटा दर्द-ए-सर गया| कैफ़ भोपाली
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तुमने वो काँटे चुभोए हैं
जान-ए-बहार तुमने वो काँटे चुभोए हैं, मैं हर गुल-ए-शगुफ़्ता को छूने से डर गया| कैफ़ भोपाली
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वो दावा किधर गया!
तुमसे न मिल के ख़ुश हैं वो दावा किधर गया, दो रोज़ में गुलाब सा चेहरा उतर गया| कैफ़ भोपाली
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ओस-नहाई रात!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| कुँवर नारायण जी को अज्ञेय जी ने अपने संपादन में प्रकाशित तीसरा सप्तक में भी सम्मिलित किया था| कुँवर नारायण जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…
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तू ने शिकवा कर दिया!
वो घर आए थे ‘नज़ीर’ ऐसे में कुछ कहना न था, शुक्र का मौक़ा था प्यारे तू ने शिकवा कर दिया| नज़ीर बनारसी
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उठ के पर्दा कर दिया!
मोहतरम पी लीजिए मौसम ने मौक़ा दे दिया, देखिए काली घटा ने उठ के पर्दा कर दिया| नज़ीर बनारसी