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हश्र बरपा कर दिया!
बंदगान-ए-दौर-ए-हाज़िर की ख़ुदाई देखिए, जिस जगह जिस वक़्त चाहा हश्र बरपा कर दिया| नज़ीर बनारसी
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समझाने भी आए!
आप समझाने भी आए क़िबला-ओ-काबा तो कब, इश्क़ ने जब बे-नियाज़-ए-दीन-ओ-दुनिया कर दिया| नज़ीर बनारसी
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अरमान पैदा कर दिया!
ज़िंदा रखने के लिए रक्खा है अच्छा सिलसिला, इक मिटाया दूसरा अरमान पैदा कर दिया| नज़ीर बनारसी
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तुमने ये क्या कर दिया!
बद-गुमानी को बढ़ा कर तुम ने ये क्या कर दिया, ख़ुद भी तन्हा हो गए मुझ को भी तन्हा कर दिया| नज़ीर बनारसी
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उतरे नहीं ताल पर पंछी!
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| कैलाश जी मुख्य रूप से हास्य-व्यंग्य की कविताओं के लिए जाने जाते थे परंतु वे नवगीत भी लिखते थे| गौतम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज…
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साहिल का इरादा!
कश्ती मौजों में डाली है मरना है यहीं जीना है यहीं, अब तूफ़ानों से घबरा कर साहिल का इरादा कौन करे| आनंद नारायण मुल्ला
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नज़ारा कौन करे!
बसने दो नशेमन को अपने फिर हम भी करेंगे सैर-ए-चमन, जब तक कि नशेमन उजड़ा है फूलों का नज़ारा कौन करे| आनंद नारायण मुल्ला
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तमन्ना कौन करे!
जब दिल था शगुफ़्ता गुल की तरह टहनी काँटा सी चुभती थी, अब एक फ़सुर्दा दिल ले कर गुलशन की तमन्ना कौन करे| आनंद नारायण मुल्ला
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उम्मीद दोबारा कौन!
दिल तेरी जफ़ा से टूट चुका अब चश्म-ए-करम आई भी तो क्या, फिर ले के इसी टूटे दिल को उम्मीद दोबारा कौन करे| आनंद नारायण मुल्ला
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पहला इशारा कौन करे
आदाब-ए-मोहब्बत में भी अजब दो दिल मिलने को राज़ी हैं, लेकिन ये तकल्लुफ़ हाइल है पहला वो इशारा कौन करे| आनंद नारायण मुल्ला