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वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी!
वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत, अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम| जौन एलिया
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बहुत दिनों तक!
आज एक बार फिर से मैं, श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – पृथ्वी हिलेगी नहीं इस बारधधकेगी भी नहींडूब जाएगी अपने ही पानी में…
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तबस्सुम आ ही जाता है
समझती हैं मआल-ए-गुल मगर क्या ज़ोर-ए-फ़ितरत है, सहर होते ही कलियों को तबस्सुम आ ही जाता है| जोश मलीहाबादी
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वो कुम्हला ही जाता है!
शगूफ़ों पर भी आती हैं बलाएँ यूँ तो कहने को, मगर जो फूल बन जाता है वो कुम्हला ही जाता है| जोश मलीहाबादी
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ये फ़ितरत है इंसाँ की!
शिकायत क्यूँ इसे कहते हो ये फ़ितरत है इंसाँ की, मुसीबत में ख़याल-ए-ऐश-ए-रफ़्ता आ ही जाता है| जोश मलीहाबादी
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बादल छा ही जाता है!
हवाएँ ज़ोर कितना ही लगाएँ आँधियाँ बन कर, मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है| जोश मलीहाबादी