तबस्सुम आ ही जाता है

समझती हैं मआल-ए-गुल मगर क्या ज़ोर-ए-फ़ितरत है,

सहर होते ही कलियों को तबस्सुम आ ही जाता है|

                जोश मलीहाबादी

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