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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Oct 2022

    तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है!

    सवाल कर दिया तिश्ना-लबी ने साग़र से, मिरी तलब से तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    मिरी मंज़िल का रास्ता क्यूँ है!

    दिलों की राह पर आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है, थका थका मिरी मंज़िल का रास्ता क्यूँ है| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं!

    जिनसे हम छूट गए अब वो जहाँ कैसे हैं, शाख़-ए-गुल कैसी है ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    वहशत की सौग़ात कहाँ!

    जिसको देखो फ़िक्र-ए-रफ़ू है जिसको देखो वो नासेह, बस्ती वालों में हार आए वहशत की सौग़ात कहाँ| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    जंगल काफ़ी है वहशत के लिए!

    बे-हिस दीवारों का जंगल काफ़ी है वहशत के लिए, अब क्यूँ हम सहरा को जाएँ अब वैसे हालात कहाँ| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    तुमने गुज़ारी रात कहाँ!

    ऐ आवारा यादो फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ, हमने तो सहरा में बसर की तुमने गुज़ारी रात कहाँ| राही मासूम रज़ा

  • 12th Oct 2022

    मुफ्त हुए बदनाम!!

    एक बार फिर से मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहरा रहा रहा हूँ, जो मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया हुआ एक अमर गीत है| आज मैं अपने प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा मानना है की मुकेश जी का गाया लगभग हर गीत अमर है|…

  • 11th Oct 2022

    जी भर के देखा न कुछ बात की!

    न जी भर के देखा न कुछ बात की, बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की| बशीर बद्र

  • 11th Oct 2022

    रहे सामने और दिखाई न दे!

    ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है, रहे सामने और दिखाई न दे| बशीर बद्र

  • 11th Oct 2022

    असीरों को ऐसी रिहाई न दे!

    ग़ुलामी को बरकत समझने लगें, असीरों को ऐसी रिहाई न दे| बशीर बद्र

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