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इतने चेहरे इतने लोग!
इस बस्ती में इतने घर थे इतने चेहरे इतने लोग, और किसी के दर पे न पहुँचा ऐसा होश दिवाने में| इब्न-ए-इंशा
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इस सारे अफ़्साने में!
किसका किसका हाल सुनाया तूने ऐ अफ़्साना-गो, हमने एक तुझी को ढूँडा इस सारे अफ़्साने में| इब्न-ए-इंशा
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ये तहरीर मिटाने में!
जनम जनम के सातों दुख हैं उसके माथे पर तहरीर, अपना आप मिटाना होगा ये तहरीर मिटाने में| इब्न-ए-इंशा
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दिल के दौलत-ख़ाने में
जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में, लैला तो ऐ क़ैस मिलेगी दिल के दौलत-ख़ाने में| इब्न-ए-इंशा
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विप्लव गान!
आज मैं हमारे देश के एक प्रमुख राष्ट्रवादी कवि रहे स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता का कुछ अंश हमारी स्कूल की पाठ्य पुस्तक में भी शामिल था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की यह कविता – कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ,जिससे उथल-पुथल…
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याद भी हैं ऐ ‘मुनीर’!
याद भी हैं ऐ ‘मुनीर’ उस शाम की तन्हाइयाँ, एक मैदाँ इक दरख़्त और तू ख़ुदा के सामने| मुनीर नियाज़ी
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बेवफ़ा के सामने!
मैं तो उसको देखते ही जैसे पत्थर हो गया, बात तक मुँह से न निकली बेवफ़ा के सामने| मुनीर नियाज़ी
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मेरी सदा के सामने!
रात इक उजड़े मकाँ पर जा के जब आवाज़ दी, गूँज उट्ठे बाम-ओ-दर मेरी सदा के सामने| मुनीर नियाज़ी
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उस हवा के सामने!
तेज़ थी इतनी कि सारा शहर सूना कर गई, देर तक बैठा रहा मैं उस हवा के सामने| मुनीर नियाज़ी