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इस अदा के सामने!
बैठ जाता है वो जब महफ़िल में आ के सामने, मैं ही बस होता हूँ उसकी इस अदा के सामने| मुनीर नियाज़ी
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आबादी में अकेला है!
कितने यार हैं फिर भी ‘मुनीर’ इस आबादी में अकेला है, अपने ही ग़म के नश्शे से अपना जी बहलाता है| मुनीर नियाज़ी
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मुझसे ही शरमाता है!
मुझ से मोहब्बत भी है उसको लेकिन ये दस्तूर है उसका, ग़ैर से मिलता है हँस हँस कर मुझसे ही शरमाता है| मुनीर नियाज़ी
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उसका हाल मुझ सा है
उसको भी तो जाकर देखो उसका हाल भी मुझ सा है, चुप चुप रह कर दुख सहने से तो इंसाँ मर जाता है| मुनीर नियाज़ी
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पीछे पीछे आता है!
अपने घर को वापस जाओ रो रो कर समझाता है, जहाँ भी जाऊँ मेरा साया पीछे पीछे आता है| मुनीर नियाज़ी
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मसूरी यात्रा!
आज एक बार फिर से, किसी जमाने में कवि सम्मेलनों में हास्य कविता का ट्रेड मार्क रहे स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| काका जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय काका हाथरसी जी की यह कविता – देवी जी कहने लगीं,…
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किधर गए वो गुनहगार
‘क़तील’ जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया, किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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नज़र है आइना-बरदार
छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के, नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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अगर ज़मीर है बेदार!
जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँ करें किसी में तलाश, अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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एक भी हसीं में नहीं!
बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं, कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई