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सलामत है जिस्म अभी!
ये भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी, ऐ ख़ुसरवान-ए-शहर क़बाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़
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दुआएँ मुझे न दो!
जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया, अब तुम तो ज़िंदगी की दुआएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़
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सदाएँ मुझे न दो!
शो‘ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो, मैं कब का जा चुका हूँ सदाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़
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क्या हुए वे!
हिन्दी साहित्य में कुछ मेरे हमनाम भी रहे हैं, जैसे पूरी तरह मेरे जैसे नाम के एक श्रीकृष्ण शर्मा भी रहे हैं, वाराणसी के एक प्रसिद्ध नवगीतकार श्रीकृष्ण तिवारी जी भी थे, जिनको मैंने एक बार अपने आयोजन में भी बुलाया था| स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक प्रसिद्ध गीत है ‘धूप में जब भी…
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गुनाहगार चले गए!
न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफ़ा ये रसन ये दार करोगे क्या, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़