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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Apr 2023

    सदाएँ मुझे न दो!

    ऐसा न हो कभी कि पलट कर न आ सकूँ, हर बार दूर जा के सदाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

  • 10th Apr 2023

    सलामत है जिस्म अभी!

    ये भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी, ऐ ख़ुसरवान-ए-शहर क़बाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

  • 10th Apr 2023

    दुआएँ मुझे न दो!

    जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया, अब तुम तो ज़िंदगी की दुआएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

  • 10th Apr 2023

    सदाएँ मुझे न दो!

    शो‘ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो, मैं कब का जा चुका हूँ सदाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

  • 10th Apr 2023

    क्या हुए वे!

    हिन्दी साहित्य में कुछ मेरे हमनाम भी रहे हैं, जैसे पूरी तरह मेरे जैसे नाम के एक श्रीकृष्ण शर्मा भी रहे हैं, वाराणसी के एक प्रसिद्ध नवगीतकार श्रीकृष्ण तिवारी जी भी थे, जिनको मैंने एक बार अपने आयोजन में भी बुलाया था|  स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक प्रसिद्ध गीत है ‘धूप में जब भी…

  • 9th Apr 2023

    रात ढल चली है!

    जाओ अब सो रहो सितारो, दर्द की रात ढल चली है|    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 9th Apr 2023

    यूँही बुझ रही हैं शमएँ!

    या यूँही बुझ रही हैं शमएँ, या शब-ए-हिज्र टल चली है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 9th Apr 2023

    रंगत बदल चली है!

    अश्क ख़ूनाब हो चले हैं, ग़म की रंगत बदल चली है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 9th Apr 2023

    हालत सँभल चली है!

    बात बस से निकल चली है, दिल की हालत सँभल चली है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 9th Apr 2023

    गुनाहगार चले गए!

    न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफ़ा ये रसन ये दार करोगे क्या, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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