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वक़्त का हाकिम!
सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है, पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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हमें गवाह बनाया है!
हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना, ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई
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इंसानियत की क़द्रों पर
सुकूत* छाया है इंसानियत की क़द्रों** पर, यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें| *Silence **Values क़तील शिफ़ाई
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सूफ़ीनामा!
शायद आज पहली बार मैं स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की कविता शेयर कर रहा हूँ, कैलाश जी दूरदर्शन में उस समय काफी आते थे जब स्वर्गीय कुबेर दत्त जी वहाँ साहित्यिक कार्यक्रम देखते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की यह कविता – घर ,कपड़े, नौकरी,शहर बिना बदले बिना प्रार्थना या उपवास के तुम…
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हथेली पे गाल रक्खा है
भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब, कि जैसे तूने हथेली पे गाल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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ख़याल रक्खा है!
हिसाब-ए-लुत्फ़-ए-हरीफ़ाँ किया है जब तो खुला, कि दोस्तों ने ज़ियादा ख़याल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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ग़म को बहाल रक्खा है
भले दिनों का भरोसा ही क्या रहें न रहें, सो मैंने रिश्ता-ए-ग़म को बहाल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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फ़ज़ा में रंग ही रंग!
हवा में नश्शा ही नश्शा फ़ज़ा में रंग ही रंग, ये किसने पैरहन अपना उछाल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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लौ को सँभाल रक्खा है!
अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है, मगर चराग़ ने लौ को सँभाल रक्खा है| अहमद फ़राज़