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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Apr 2023

    वक़्त का हाकिम!

    सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है, पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई

  • 11th Apr 2023

    हमें गवाह बनाया है!

    हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना, ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई

  • 11th Apr 2023

    इंसानियत की क़द्रों पर

    सुकूत* छाया है इंसानियत की क़द्रों** पर, यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें| *Silence **Values क़तील शिफ़ाई

  • 11th Apr 2023

    आओ सच बोलें!

    खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें, न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई

  • 11th Apr 2023

    सूफ़ीनामा!

    शायद आज पहली बार मैं स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की कविता शेयर कर रहा हूँ, कैलाश जी दूरदर्शन में उस समय काफी आते थे जब स्वर्गीय कुबेर दत्त जी वहाँ साहित्यिक कार्यक्रम देखते थे|  लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश वाजपेयी जी की यह कविता –  घर ,कपड़े, नौकरी,शहर बिना बदले    बिना प्रार्थना या उपवास के    तुम…

  • 10th Apr 2023

    हथेली पे गाल रक्खा है

    भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब, कि जैसे तूने हथेली पे गाल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 10th Apr 2023

    ख़याल रक्खा है!

    हिसाब-ए-लुत्फ़-ए-हरीफ़ाँ किया है जब तो खुला, कि दोस्तों ने ज़ियादा ख़याल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 10th Apr 2023

    ग़म को बहाल रक्खा है

    भले दिनों का भरोसा ही क्या रहें न रहें, सो मैंने रिश्ता-ए-ग़म को बहाल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 10th Apr 2023

    फ़ज़ा में रंग ही रंग!

    हवा में नश्शा ही नश्शा फ़ज़ा में रंग ही रंग, ये किसने पैरहन अपना उछाल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 10th Apr 2023

    लौ को सँभाल रक्खा है!

    अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है, मगर चराग़ ने लौ को सँभाल रक्खा है| अहमद फ़राज़

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