-
बहुत सी दुआएँ भेजी हैं
गुलों को सुनना ज़रा तुम सदाएँ भेजी हैं, गुलों के हाथ बहुत सी दुआएँ भेजी हैं| गुलज़ार
-
नवनिर्माण का संकल्प!
आज एक फिर से मैं श्रेष्ठ गीतकार और देश में नवगीत आंदोलन के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह गीत – विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर! यहाँ राह अपनी बनाने चले हम,यहाँ प्यास अपनी बुझाने चले हम,जहाँ…
-
बेताबियाँ, अंगड़ाइयाँ!
क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात, करवटें, बेताबियाँ, अंगड़ाइयाँ| कैफ़ भोपाली
-
दोपहर का समय था तब – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
-
वक़्त का मारा लगता है
‘कैफ़’ वो कल का ‘कैफ़’ कहाँ है आज मियाँ, ये तो कोई वक़्त का मारा लगता है| कैफ़ भोपाली