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बाग़ में कोई ज़रूर था!
निकला जो चाँद आई महक तेज़ सी ‘मुनीर’, मेरे सिवा भी बाग़ में कोई ज़रूर था| मुनीर नियाज़ी
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सदा थी किसी भूली याद की!
चेहरा था या सदा थी किसी भूली याद की, आँखें थीं उसकी यारो कि दरिया-ए-नूर था| मुनीर नियाज़ी
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अपने आप पे कितना ग़ुरूर था!
शाम-ए-फ़िराक़ आई तो दिल डूबने लगा, हमको भी अपने आप पे कितना ग़ुरूर था| मुनीर नियाज़ी
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वतन से कई मील दूर था!
रोया था कौन कौन मुझे कुछ ख़बर नहीं, मैं उस घड़ी वतन से कई मील दूर था| मुनीर नियाज़ी
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वो भी बहुत ग़म से चूर था!
कल मैंने उसको देखा तो देखा नहीं गया, मुझ से बिछड़ के वो भी बहुत ग़म से चूर था| मुनीर नियाज़ी
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वही रश्क-ए-हूर था!
पी ली तो कुछ पता न चला वो सुरूर था, वो उसका साया था कि वही रश्क-ए-हूर था| मुनीर नियाज़ी
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गन्ने मेरे भाई!!
आज मैं बिना किसी भूमिका के स्वर्गीय बालकवि वैरागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, बाकी कविता अपनी बात स्वयं कहती है| बालकवि वैरागी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|लीजिए प्रस्तुत है बालकवि वैरागी जी की यह कविता – इक्ष्वाकु वंश के आदि पुरुषगन्ने! मेरे भाई!!रेशे-रेशे में रसऔर रग-रग…
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यारों से दामन न छुड़ाओ इंशा-जी!
नहीं सिर्फ़ ‘क़तील’ की बात यहाँ कहीं ‘साहिर’ है कहीं ‘आली’ है, तुम अपने पुराने यारों से दामन न छुड़ाओ इंशा-जी| क़तील शिफ़ाई