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ये शिकायत ना हुई!
दूर से था वो कई चेहरों में पास से कोई भी वैसा न लगा, बेवफ़ाई भी उसी का था चलन फिर किसी से ये शिकायत ना हुई| निदा फ़ाज़ली
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तिजारत ना हुई!
जिससे जब तक मिले दिल ही से मिले दिल जो बदला तो फ़साना बदला, रस्म-ए-दुनिया को निभाने के लिए हम से रिश्तों की तिजारत ना हुई| निदा फ़ाज़ली
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जीने की सूरत ना हुई!
कुछ तबी‘अत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत ना हुई, जिसको चाहा उसे अपना न सके जो मिला उससे मोहब्बत ना हुई| निदा फ़ाज़ली
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हर इक सूरत!
हर इक सूरत भली लगती है कुछ दिन, लहू की शो’बदा-कारी* से बचिए| *मंत्रमुग्ध करना निदा फ़ाज़ली
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याद तुम्हारी!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| माहेश्वर जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – याद तुम्हारी जैसे कोईकंचन-कलश भरे।जैसे कोई किरन अकेलीपर्वत…
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ये किस मक़ाम पे!
ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया ज़माने ने, कि अब हयात पे तेरा भी इख़्तियार नहीं| साहिर लुधियानवी