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मौत नागवार नहीं!
गुरेज़ का नहीं क़ाइल हयात से लेकिन, जो सच कहूँ कि मुझे मौत नागवार नहीं| साहिर लुधियानवी
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ए’तिबार नहीं!
तुम्हारे अहद-ए-वफ़ा को मैं अहद क्या समझूँ, मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत पे ए’तिबार नहीं| साहिर लुधियानवी
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ख़ुश-गवार नहीं!
अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब, अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं| साहिर लुधियानवी
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हमीं से रंग-ए-बहार!
हमीं से रंग-ए-गुलिस्ताँ हमीं से रंग-ए-बहार, हमीं को नज़्म-ए-गुलिस्ताँ पे इख़्तियार नहीं| साहिर लुधियानवी
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तेरा इंतिज़ार नहीं!
हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं, मैं मुंतज़िर हूँ मगर तेरा इंतिज़ार नहीं| साहिर लुधियानवी
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गुज़रे जिधर से हम!
माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके, कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम| साहिर लुधियानवी
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किसी की नज़र से हम!
ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है, क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम| साहिर लुधियानवी
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मायूस तो नहीं हैं!
कुछ और बढ़ गए जो अँधेरे तो क्या हुआ, मायूस तो नहीं हैं तुलू-ए-सहर* से हम| *सूर्योदय साहिर लुधियानवी
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उदास तुम!
आज एक बार फिर से मैं साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले तथा धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भारती जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की…
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ज़माने के डर से हम!
भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागर से हम, ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम| साहिर लुधियानवी