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आसमाँ हमारी तरफ़!
उछाल देते हैं पत्थर ख़ला में हम जो कभी, पलट के देखता है आसमाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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कमाँ हमारी तरफ़!
लगा के जान की बाज़ी जिसे बचाया था, खिंची हुई है उसी की कमाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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बस्तियाँ जला के मगर!
कहाँ कहाँ न छुपे बस्तियाँ जला के मगर, जहाँ जहाँ गए आया धुआँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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दास्ताँ हमारी तरफ़!
इसी उमीद पे किरदार हम निभाते रहे, कि रुख़ करेगी कभी दास्ताँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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ख़िज़ाँ हमारी तरफ़!
बिछड़ते वक़्त वो तक़्सीम कर गया मौसम, बहार उसकी तरफ़ है ख़िज़ाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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कुआँ हमारी तरफ़!
खड़े हैं प्यासे अना के इसी भरोसे पर, कि चल के आएगा इक दिन कुआँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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न जाँ हमारी तरफ़!
न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़, है कुछ भी हम में हमारा कहाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी
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वसंतागमन!
आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनको अपनी रचनाओं के लिए सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य वाचस्पति सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की…
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न जिसका नाम है कोई
न जिसका नाम है कोई न जिस की शक्ल है कोई, इक ऐसी शय का क्यूँ हमें अज़ल से इंतिज़ार है| शहरयार
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हर एक दिल फ़िगार है!
हर एक जिस्म रूह के अज़ाब से निढाल है, हर एक आँख शबनमी हर एक दिल फ़िगार है| शहरयार