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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Jul 2023

    आसमाँ हमारी तरफ़!

    उछाल देते हैं पत्थर ख़ला में हम जो कभी, पलट के देखता है आसमाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी

  • 5th Jul 2023

    कमाँ हमारी तरफ़!

    लगा के जान की बाज़ी जिसे बचाया था, खिंची हुई है उसी की कमाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी

  • 5th Jul 2023

    बस्तियाँ जला के मगर!

    कहाँ कहाँ न छुपे बस्तियाँ जला के मगर, जहाँ जहाँ गए आया धुआँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी

  • 5th Jul 2023

    दास्ताँ हमारी तरफ़!

    इसी उमीद पे किरदार हम निभाते रहे, कि रुख़ करेगी कभी दास्ताँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी

  • 5th Jul 2023

    ख़िज़ाँ हमारी तरफ़!

    बिछड़ते वक़्त वो तक़्सीम कर गया मौसम, बहार उसकी तरफ़ है ख़िज़ाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी

  • 5th Jul 2023

    कुआँ हमारी तरफ़!

    खड़े हैं प्यासे अना के इसी भरोसे पर, कि चल के आएगा इक दिन कुआँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी

  • 5th Jul 2023

    न जाँ हमारी तरफ़!

    न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़, है कुछ भी हम में हमारा कहाँ हमारी तरफ़| राजेश रेड्डी

  • 5th Jul 2023

    वसंतागमन!

    आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ|  उनको अपनी रचनाओं के लिए सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य वाचस्पति सहित अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की…

  • 4th Jul 2023

    न जिसका नाम है कोई

    न जिसका नाम है कोई न जिस की शक्ल है कोई, इक ऐसी शय का क्यूँ हमें अज़ल से इंतिज़ार है| शहरयार

  • 4th Jul 2023

    हर एक दिल फ़िगार है!

    हर एक जिस्म रूह के अज़ाब से निढाल है, हर एक आँख शबनमी हर एक दिल फ़िगार है| शहरयार

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