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चाँद ने पानी में देखा!
अपनी ही तेग़-ए-अदा से आप घायल हो गया, चाँद ने पानी में देखा और पागल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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कहीं चला भी गया!
चलो ‘मुनीर’ चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या, वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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हिना की ख़ुशबू थी!
हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी, ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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भीगा दिन!
आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की यह कविता – भीगा दिनपश्चिमी तटों में उतर चुका है,बादल-ढकी…
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ख़ून आ भी गया
न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी, वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया| मुनीर नियाज़ी
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जल उठी बिजली!
ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली, बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया| मुनीर नियाज़ी
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नींद से जगा भी गया!
उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था, सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया| मुनीर नियाज़ी
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जिगर जला भी गया!
हँसी छुपा भी गया और नज़र मिला भी गया, ये इक झलक का तमाशा जिगर जला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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लगता है महसूल मियाँ!
‘इंशा’ जी क्या उज़्र है तुमको नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ नज़्र करो, रूप-नगर के नाके पर ये लगता है महसूल मियाँ| इब्न-ए-इंशा