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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Jul 2023

    इंशा-जी दीवाने थे!

    वहशत का उनवान हमारी उनमें से जो नार बनी, देखेंगे तो लोग कहेंगे ‘इंशा’-जी दीवाने थे| इब्न-ए-इंशा 

  • 1st Jul 2023

    ओस-बिंदु सम ढरके!

    आज मैं एक प्रमुख राष्ट्रवादी हिन्दी कवि पद्मभूषण स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की यह कविता –   हम तो ओस-बिंदु सम ढरकेआए इस जड़ता में चेतन तरल रूप कुछ…

  • 30th Jun 2023

    आँखों में अफ़्साने थे!

    ज़िद्दी वहशी अल्लहड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग, होंट उनके ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे| इब्न-ए-इंशा

  • 30th Jun 2023

    सब जाने-पहचाने थे!

    रात के ख़्वाब सुनाएँ किसको, रात के ख़्वाब सुहाने थे, धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे| इब्न-ए-इंशा 

  • 30th Jun 2023

    कम है तो मुझे क्या!

    मैं सरमद ओ मंसूर बना हूँ तिरी ख़ातिर, ये भी तिरी उम्मीद से कम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 30th Jun 2023

    सनम है तो मुझे क्या!

    पत्थर न पड़ें गर सर-ए-बाज़ार तो कहना, तू मोतरिफ़-ए-हुस्न-ए-सनम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 30th Jun 2023

    सुक़रात का अंजाम!

    भूला तो न होगा तुझे सुक़रात का अंजाम, हाथों में तिरे साग़र-ए-सम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 30th Jun 2023

    मैंने तो पुकारा है!

    मैंने तो पुकारा है मोहब्बत के उफ़क़ से, रस्ते में तिरे संग-ए-हरम है तो मुझे क्या|

  • 30th Jun 2023

    उस दर पे तिरा सर!

    जिस दर से नदामत के सिवा कुछ नहीं मिलता, उस दर पे तिरा सर भी जो ख़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई

  • 30th Jun 2023

    मुझे क़तरा भी मिला हो

    हाँ ले ले क़सम गर मुझे क़तरा भी मिला हो, तू शाकी-ए-अर्बाब-ए-करम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई 

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