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खोलें क्या स्कूल मियाँ!
खेलने दें उन्हें इश्क़ की बाज़ी खेलेंगे तो सीखेंगे, ‘क़ैस’ की या ‘फ़रहाद’ की ख़ातिर खोलें क्या स्कूल मियाँ| इब्न-ए-इंशा
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देते क्यूँ हो तूल मियाँ!
सुन तो लिया किसी नार की ख़ातिर काटा कोह निकाली नहर, एक ज़रा से क़िस्से को अब देते क्यूँ हो तूल मियाँ| इब्न-ए-इंशा
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ओस!
आज एक बार फिर से मैं प्रमुख राष्ट्रवादी हिन्दी कवि स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| द्विवेदी जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की यह कविता – हरी घास पर बिखेर दी हैंये किसने मोती की लड़ियाँ?कौन…
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दिल को फ़र्श करें!
नस्ब करें मेहराब-ए-तमन्ना दीदा ओ दिल को फ़र्श करें, सुनते हैं वो कू-ए-वफ़ा में आज करेंगे नुज़ूल मियाँ| इब्न-ए-इंशा
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बाक़ी बात फ़ुज़ूल मियाँ
ये तो कहो कभी इश्क़ किया है जग में हुए हो रुस्वा भी? इसके सिवा हम कुछ भी न पूछें बाक़ी बात फ़ुज़ूल मियाँ| इब्न-ए-इंशा
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जंगल जंगल फूल मियाँ
यूँही तो नहीं दश्त में पहुँचे यूँही तो नहीं जोग लिया, बस्ती बस्ती काँटे देखे जंगल जंगल फूल मियाँ| इब्न-ए-इंशा
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होगा तिरा उसूल मियाँ!
अहल-ए-वफ़ा से बात न करना होगा तिरा उसूल मियाँ, हम क्यूँ छोड़ें उन गलियों के फेरों का मामूल मियाँ| इब्न-ए-इंशा
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देख हमें मत भूल मियाँ
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ, हमसे अजब तिरा दर्द का नाता देख हमें मत भूल मियाँ| इब्न-ए-इंशा
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कितने और ठिकाने थे!
हमको सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने, हम क्यूँ उनके दर पर उतरे कितने और ठिकाने थे| इब्न-ए-इंशा
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इसके लाख बहाने थे!
ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी, इससे उनको मिलना था तो इसके लाख बहाने थे| इब्न-ए-इंशा