जीने की सूरत ना हुई!

कुछ तबी‘अत ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत ना हुई,

जिसको चाहा उसे अपना न सके जो मिला उससे मोहब्बत ना हुई|

निदा फ़ाज़ली

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