-
कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ!
कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ, उनसे कितना कुछ कहने की कोशिश की| गुलज़ार
-
चाँद का ख़ंजर घोंप के सीने में!
कल फिर चाँद का ख़ंजर घोंप के सीने में, रात ने मेरी जाँ लेने की कोशिश की| गुलज़ार
-
टहनी से उड़ने की कोशिश की!
फूल ने टहनी से उड़ने की कोशिश की, इक ताइर* का दिल रखने की कोशिश की|*पक्षी गुलज़ार
-
सामने फ्लैट पर!
हिन्दी के विख्यात व्यंग्यकार और कवि स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी की इस कविता में भी व्यंग्यकार की दृष्टि परिलक्षित होती है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – सामने फ्लैट परजाड़ों की सुबह नेअलसाकर जूड़ा बाँधा; नीचे के तल्ले मेंमफ़लर…
-
किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं!
हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले ‘ताबिश,’ जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं!
उनके भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है, जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
ध्यान में लाते हुए मर जाते हैं!
किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप-चाप, हम तो ये ध्यान में लाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
तिरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं!
घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा, हम तिरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश