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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Jul 2023

    मौत से डराते हैं!

    ये बेवक़ूफ़ उन्हें मौत से डराते हैं, जो ख़ुद ही साया-ए-ख़ंजर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना

  • 18th Jul 2023

    न जाने कैसी थकन थी

    न जाने कैसी थकन थी कभी नहीं उतरी, चले जो घर से तो दफ़्तर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना

  • 18th Jul 2023

    हमारी तिश्ना-नसीबी!

    हमारी तिश्ना-नसीबी का हाल मत पूछो, वो प्यास थी कि समुंदर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना

  • 18th Jul 2023

    तमाम उम्र हम!

    तमाम उम्र हम इक दूसरे से लड़ते रहे, मगर मरे तो बराबर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना

  • 18th Jul 2023

    थकन को ओढ़ के!

    थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए, हम अपनी क़ब्र-ए-मुक़र्रर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना

  • 18th Jul 2023

    दुपहरिया!

    आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में से एक प्रमुख कवि की रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल एक नवगीत आज प्रस्तुत है| सिंह जी की इस कविता में गर्मी की दुपहरी का प्रभावी चित्रण किया गया है|    लीजिए आज प्रस्तुत है…

  • 17th Jul 2023

    मा’नी-ए-दिल का करे

    मा‘नी-ए-दिल का करे इज़हार ‘अकबर’ किस तरह, लफ़्ज़ मौज़ूँ बहर-ए-कश्फ़-ए-मुद्दआ मिलता नहीं|   अकबर इलाहाबादी

  • 17th Jul 2023

    बे तिरे मुझ को तो!

    चाँदनी रातें बहार अपनी दिखाती हैं तो क्या, बे तिरे मुझ को तो लुत्फ़ ऐ मह-लक़ा मिलता नहीं| अकबर इलाहाबादी

  • 17th Jul 2023

    चल बसे वो दिन!

    चल बसे वो दिन कि यारों से भरी थी अंजुमन, हाए अफ़्सोस आज सूरत-आश्ना मिलता नहीं| अकबर इलाहाबादी

  • 17th Jul 2023

    ख़ुदा मिलता नहीं!

    अहल-ए-ज़ाहिर जिस क़दर चाहें करें बहस-ओ-जिदाल, मैं ये समझा हूँ ख़ुदी में तो ख़ुदा मिलता नहीं| अकबर इलाहाबादी

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