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उठे बादल !
आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के एक कवि स्वर्गीय हरि नारायण व्यास जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| व्यास जी की इस कविता में वर्षा के वातावरण का बहुत प्रभावी चित्रण किया गया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरि नारायण व्यास जी की यह कविता…
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मिरी बेबसी पे रो देते!
जो देखते मिरी नज़रों पे बंदिशों के सितम, तो ये नज़ारे मिरी बेबसी पे रो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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सफ़ीना मिरा डुबो देते!
बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना, किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते| मजरूह सुल्तानपुरी