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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Jul 2023

    दर से क्यूँ उठाते हो!

    कहा जो हम ने ”हमें दर से क्यूँ उठाते हो”, कहा कि ”इस लिए तुम याँ जो ग़ुल मचाते हो’| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    ऐसे दीवाने को हम!

    बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल, अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    क्या ख़ुदाई रह गई!

    ताक़-ए-अबरू में सनम के क्या ख़ुदाई रह गई, अब तो पूजेंगे उसी काफ़िर के बुत-ख़ाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    आब और दाने को हम!

    हमको फँसना था क़फ़स में क्या गिला सय्याद का, बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    ग़म खाने को हम!

    क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर, क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    आग मय-ख़ाने को हम

    मय भी है मीना भी है साग़र भी है साक़ी नहीं, दिल में आता है लगा दें आग मय-ख़ाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    बस तरसते ही चले!

    दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम, बस तरसते ही चले अफ़्सोस पैमाने को हम| नज़ीर अकबराबादी

  • 15th Jul 2023

    उठे बादल !

    आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के एक कवि स्वर्गीय हरि नारायण व्यास जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| व्यास जी की इस कविता में वर्षा के वातावरण का बहुत प्रभावी चित्रण किया गया है|    लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरि नारायण व्यास जी की यह कविता…

  • 14th Jul 2023

    मिरी बेबसी पे रो देते!

    जो देखते मिरी नज़रों पे बंदिशों के सितम, तो ये नज़ारे मिरी बेबसी पे रो देते| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    सफ़ीना मिरा डुबो देते!

    बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना, किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते| मजरूह सुल्तानपुरी

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