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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th Jul 2023

    आरज़ू भी खो देते!

    बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए, हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    हम आस्तीं भिगो देते!

    कहाँ वो शब कि तिरे गेसुओं के साए में, ख़याल-ए-सुब्ह से हम आस्तीं भिगो देते| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    ग़म को भी समो देते!

    मसर्रतों को ये अहल-ए-हवस न खो देते, जो हर ख़ुशी में तिरे ग़म को भी समो देते| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    ये झुकी झुकी कुलाहें!

    मिरे अहद में नहीं है ये निशान-ए-सरबुलंदी, ये रंगे हुए अमामे ये झुकी झुकी कुलाहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    वहीं डाल दी हैं बाँहें!

    कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल-शिकस्ता, तिरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    वहीं इनकी बारगाहें!

    तिरे ख़ानुमाँ-ख़राबों* का चमन कोई न सहरा, ये जहाँ भी बैठ जाएँ वहीं इनकी बारगाहें| *बर्बाद, मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    नक़्श-ए-पा से राहें!

    कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश-ए-दश्त-ए-रहबर, कहीं जगमगा उठी हैं मिरे नक़्श-ए-पा से राहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    ये दबी दबी सी आहें!

    ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें, यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th Jul 2023

    दोपहरी!

    आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ की एक महिला कवि स्वर्गीया शकुंत माथुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शकुंत जी की इस कविता में गर्मी के वातावरण का बहुत प्रभावी चित्रण किया गया है|    लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया शकुंत माथुर जी की यह कविता –…

  • 13th Jul 2023

    गए दिनों की लाश पर!

    गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक, अलम-कशो उठो कि आफ़्ताब सर पे आ गया| नासिर काज़मी

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