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अब गिला भी नहीं!
कभी जो तल्ख़-कलामी थी वो भी ख़त्म हुई, कभी गिला था हमें उनसे अब गिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
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कभी मिला भी नहीं!
कभी तो बात की उसने कभी रहा ख़ामोश, कभी तो हँस के मिला और कभी मिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
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कुछ हुआ भी नहीं!
कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ, कभी ये लगता है अब तक तो कुछ हुआ भी नहीं| जावेद अख़्तर
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मिरा ख़ुदा भी नहीं!
मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं, तिरा तो कोई ख़ुदा है मिरा ख़ुदा भी नहीं| जावेद अख़्तर
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चांदनी!
आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ एक महत्वपूर्ण हिन्दी कवि स्वर्गीय राम विलास शर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| राम विलास शर्मा जी ने साहित्य और अन्य महत्वपूर्ण विषयों से संबंधित लगभग सौ पुस्तकें लिखी थीं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राम विलास शर्मा जी की…
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वक़्त का मारा लगता है
‘कैफ़’ वो कल का ‘कैफ़’ कहाँ है आज मियाँ, ये तो कोई वक़्त का मारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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फूल कँवारा लगता है!
तितली चमन में फूल से लिपटी रहती है, फिर भी चमन में फूल कँवारा लगता है| कैफ़ भोपाली