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हम-सुख़न तेरी ख़ामुशी है अभी!
तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या, हम-सुख़न तेरी ख़ामुशी है अभी| नासिर काज़मी
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मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार !
आज मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि और शिक्षाविद स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कविता के अनेक सम्मानों के अलावा सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान पद्मश्री एवं पद्मभूषण से भी अलंकृत किया गया था| उन्होंने शिक्षा और प्रशासन के क्षेत्र में अनेक उच्च…