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पलकें बोझल रहती थीं!
एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं, एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं| जावेद अख़्तर
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चाँद पे परियाँ रहती थीं!
मुझको यकीं है सच कहती थी, जो भी अम्मी कहती थी, जब मेरे बचपन के दिन थे, चाँद पे परियाँ रहती थीं| जावेद अख़्तर
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इस भरी दुनिया में है तन्हा किया!
क्या बताऊँ कौन था जिसने मुझे, इस भरी दुनिया में है तन्हा किया| जावेद अख़्तर
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कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी!
कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी, तुमसे क्या कहते कि तुमने क्या किया| जावेद अख़्तर
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ख़ैर तुमने जो किया अच्छा किया!
बंध गई थी दिल में कुछ उम्मीद सी, ख़ैर तुमने जो किया अच्छा किया| जावेद अख़्तर
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मुझको सरकार बनाने दो!
हास्य-व्यंग्य के अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| अल्हड़ जी की कुछ कविताएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की यह कविता – जो बुढ्ढे खूसट नेता हैं, उनको खड्डे में जाने दो।बस एक बार, बस…
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जो गुज़री हमें है याद सब!
तल्ख़ियाँ कैसे न हों अशआ’र में, हम पे जो गुज़री हमें है याद सब| जावेद अख़्तर