-
बादल आये रे!
आज एक बार फिर से मैं, साहित्य के सभी क्षेत्रों में अपने कृतित्व की छाप छोड़ने वाले श्री रामदरश मिश्र जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल – पानी बरसा…
-
कब हश्र मुअ’य्यन है !
कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामत-ए-जानाना, कब हश्र मुअ’य्यन है तुझको तो ख़बर होगी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
यारों की किस तरह बसर होगी!
वाइ’ज़ है न ज़ाहिद है नासेह है न क़ातिल है, अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
कब जान लहू होगी!
कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगा, किस दिन तिरी शुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
सुनते थे सहर होगी!
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी, सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
सुब्ह किधर निकल गई!
आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र ‘फ़ैज़’ न जाने क्या हुए, रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
बात बदल बदल गई!
दिल से तो हर मोआ’मला करके चले थे साफ़ हम, कहने में उनके सामने बात बदल बदल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
रात मचल मचल गई!
जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी, जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
हिज्र की रात ढल गई!
बज़्म-ए-ख़याल में तिरे हुस्न की शम्अ जल गई, दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़