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किसी का सोचना अच्छा लगा!
सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे, कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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वो किसी का देखना अच्छा लगा!
भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा, सब से छुपकर वो किसी का देखना अच्छा लगा| अमजद इस्लाम अमजद
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तुझसे गिला नहीं करते!
ये और बात है तुझसे गिला नहीं करते, जो ज़ख़्म तूने दिए हैं भरा नहीं करते| अमजद इस्लाम अमजद
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साथी, सांझ लगी अब होने!
हिन्दी गीत विधा में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले, अपने समय में कवि सम्मेलनों की शान रहे स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में बच्चन जी ने शाम के कुछ चित्र प्रस्तुत किए हैं| बच्चन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए…
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तिरा तज़्किरा निकल आया!
मिरी ग़ज़ल में किसी बेवफ़ा का ज़िक्र न था, न जाने कैसे तिरा तज़्किरा निकल आया| राजेश रेड्डी
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वही दुख मिरा निकल आया!
दुआ सलाम से आगे जो थोड़ी बात बढ़ी, जो उसका दुख था वही दुख मिरा निकल आया| राजेश रेड्डी
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नया फ़ासला निकल आया!
बढ़े कुछ इस तरह दोनों ही दोस्ती की तरफ़, कि दरमियाँ में नया फ़ासला निकल आया| राजेश रेड्डी
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मिरे क़द से बड़ा निकल आया!
ये मेरा अक्स है या और है कोई मुझ में, कि जिसका क़द मिरे क़द से बड़ा निकल आया| राजेश रेड्डी
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नया ज़ाइक़ा निकल आया!
कुछ आज अश्कों की लज़्ज़त नई नई सी है, पुराने ग़म का नया ज़ाइक़ा निकल आया| राजेश रेड्डी
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दोस्त मिरा आईना निकल आया!
इक और नाम जुड़ा दुश्मनों के नामों में, इक और दोस्त मिरा आईना निकल आया| राजेश रेड्डी