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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Jul 2021

    ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया!

    आज मन हो रहा कि संत कबीर दास जी को याद कर लें| कवि-कलाकार आदि आज की ज़िंदगी का चित्रण अपने हिसाब से करते रहते हैं और हम उनकी प्रस्तुति को देखते/पढ़ते रहते हैं| आज देखते हैं कि संत कबीर दास जी के इस बारे में क्या विचार हैं| वैसे इस भजन की पंक्तियों का…

  • 16th Jul 2021

    तुम हो जाओ अविचल!

    आज मैं पुनः अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहरा रहा हूँ| आज मैं विख्यात कवि, नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई एक कविता के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने…

  • 15th Jul 2021

    ऑनलाइन इंटरव्यू!

    अपनी पुरानी और कुछ नई कविताएं शेयर करने का सिलसिला फिलहाल बंद करता हूँ, आज इस क्रम की अंतिम कविता के साथ| फिर कोई नई कविता जन्म लेगी तो शेयर करूंगा, लीजिए आज यह गीत प्रस्तुत है- इंटरव्यू देते हैं रोज हम, रोज मुस्कुराते हैं| रोज़गार पाने को, आवश्यक मुस्काना,उनको क्या गरज हमारी पतली हालत…

  • 14th Jul 2021

    सूर्यमुखी का प्रण!

    अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में आज यह अंतिम पुरानी रचना है, जो बहुत प्रयास करने पर भी पूरी याद नहीं आ सकी| इसे मैं कुछ जगह इसकी तुरपाई करने के बाद प्रस्तुत कर रहा हूँ| इस रचना में मैंने जीवन के, दिन के और मौसम के तीन चरणों को एक साथ प्रस्तुत…

  • 13th Jul 2021

    टोले के कवि!

    मैं पिछले दिनों (फ़ेसबुक पर) अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा था, परंतु आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह पुराना नहीं, अभी का है| एक पुरानी घटना याद आ रही है, मैं उस समय अपने संस्थान के लिए कवि-सम्मेलन आयोजित करता था| उस समय मंच के एक कवि थे- निर्भय हाथरसी, वे…

  • 12th Jul 2021

    अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते!

    अकबर इलाहाबादी साहब एक महान शायर थे जिन्होंने मजाहिया से लेकर गंभीर तक, सभी प्रकार की शायरी की है| जैसे- ‘क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ’ से लेकर ‘हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है’ तक| लीजिए आज प्रस्तुत है, अकबर इलाहाबादी साहब की यह ग़ज़ल– आँखें मुझे…

  • 11th Jul 2021

    टूटा पहिया!

    मैंरथ का टूटा हुआ पहिया हूँलेकिन मुझे फेंको मत ! क्या जाने कबइस दुरूह चक्रव्यूह मेंअक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआकोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय ! अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भीबड़े-बड़े महारथीअकेली निहत्थी आवाज़ कोअपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहेंतब मैंरथ का टूटा हुआ पहियाउसके हाथों मेंब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ…

  • 10th Jul 2021

    तुम प्राणों की अगन हरो तो!

    आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट- एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के दुलारे गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक प्रेम की गहनता और पवित्रता से भरा गीत शेयर कर रहा हूँ| भावुकता और समर्पण वैसे तो जीवन में कठिनाई से ही कहीं काम आते हैं, आजकल बहुत कम…

  • 9th Jul 2021

    अखबारवाला!

    श्री रघुवीर सहाय जी अपने समय के एक श्रेष्ठ कवि रहे हैं, बेबाक अंदाज़ में अपनी बात कहते थे, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ जिसे अज्ञेय जी ने शुरू किया था, उनके बाद उसके संपादक रघुवीर सहाय जी बने थे| खबरों के विश्लेषण के मामले में ‘दिनमान’ का अपना विशेष स्थान…

  • 8th Jul 2021

    जितनी गठरी भारी होगी!

    आज हिन्दी मंचों और फिल्मों के लाडले गीतकार स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी के गीतों में अक्सर दर्शन भी शामिल होता है, जैसे इस गीत में भरपूर है| लीजिए आज नीरज जी का यह सुंदर गीत प्रस्तुत है – जितना कम सामान रहेगा,उतना सफ़र आसान रहेगा|…

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