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बस्तियाँ!
हिन्दी के एक श्रेष्ठ रचनाकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| श्री रामदरश मिश्र जी ने साहित्य की सभी विधाओं में अपना योगदान किया है | उनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल– इस हाल…
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सैर करो ख़ामोश रहो!
गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं, इस बगिया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा
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सोचो हाँ फिर सोचो ख़ामोश रहो!
महबस में कुछ हब्स है और ज़ंजीर का आहन चुभता है, फिर सोचो हाँ फिर सोचो हाँ फिर सोचो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा
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सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो!
उनका ये कहना सूरज ही धरती के फेरे करता है, सर-आँखों पर सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा
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क्यूँ सुक़रात बनो ख़ामोश रहो!
सच अच्छा पर उसके जिलौ में ज़हर का है इक प्याला भी, पागल हो क्यूँ नाहक़ को सुक़रात बनो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा
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ऐ लोगो ख़ामोश रहो!
कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो, ऐ लोगो ख़ामोश रहो हाँ ऐ लोगो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा
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धूप से नफ़रत उसे भी थी!
तन्हा हुआ सफ़र में तो मुझ पे खुला ये भेद, साए से प्यार धूप से नफ़रत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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हर साँस क़यामत उसे भी थी!
वो मुझसे बढ़ के ज़ब्त का आदी था जी गया, वर्ना हर एक साँस क़यामत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी