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सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो!
उनका ये कहना सूरज ही धरती के फेरे करता है, सर-आँखों पर सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा
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क्यूँ सुक़रात बनो ख़ामोश रहो!
सच अच्छा पर उसके जिलौ में ज़हर का है इक प्याला भी, पागल हो क्यूँ नाहक़ को सुक़रात बनो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा
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ऐ लोगो ख़ामोश रहो!
कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो, ऐ लोगो ख़ामोश रहो हाँ ऐ लोगो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा
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धूप से नफ़रत उसे भी थी!
तन्हा हुआ सफ़र में तो मुझ पे खुला ये भेद, साए से प्यार धूप से नफ़रत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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हर साँस क़यामत उसे भी थी!
वो मुझसे बढ़ के ज़ब्त का आदी था जी गया, वर्ना हर एक साँस क़यामत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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कितना अच्छा होता है!
आज फिर से मैं हिन्दी के विख्यात कवि तथा साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की अपनी विशिष्ट शैली रही है और उन्होंने कुछ कालजयी रचनाएं की हैं| उनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|…
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शहर-भर से अदावत उसे भी थी!
मुझ से बिछड़ के शहर में घुल-मिल गया वो शख़्स, हालाँकि शहर-भर से अदावत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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शौक़ था नए चेहरों की दीद का!
मुझ को भी शौक़ था नए चेहरों की दीद का, रस्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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किसी से मोहब्बत उसे भी थी!
ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी, मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी