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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th Feb 2023

    सबको यहीं से सलाम किया!

    किसका काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहराम, कूचे के उसके बाशिंदों ने सबको यहीं से सलाम किया| मीर तक़ी मीर

  • 24th Feb 2023

    हम को अबस बदनाम किया!

    नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की, चाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया| मीर तक़ी मीर

  • 24th Feb 2023

    सुब्ह हुई आराम किया!

    अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद, या’नी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया| मीर तक़ी मीर

  • 24th Feb 2023

    आख़िर काम तमाम किया!

    उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया, देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया| मीर तक़ी मीर

  • 24th Feb 2023

    इश्क़ का मारा जाने है!

    क्या क्या फ़ित्ने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना, जिस बे-दिल बे-ताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है| मीर तक़ी मीर

  • 24th Feb 2023

    इस दर्द का चारा जाने है!

    चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं, वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है| मीर तक़ी मीर

  • 24th Feb 2023

    बाग़ तो सारा जाने है!

    पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है| मीर तक़ी मीर

  • 24th Feb 2023

    बस्तियाँ!

    हिन्दी के एक श्रेष्ठ रचनाकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| श्री रामदरश मिश्र जी ने साहित्य की सभी विधाओं में अपना योगदान किया है | उनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल– इस हाल…

  • 23rd Feb 2023

    लब सी लो ख़ामोश रहो!

    आँखें मूँद किनारे बैठो मन के रक्खो बंद किवाड़, ‘इंशा’-जी लो धागा लो और लब सी लो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा

  • 23rd Feb 2023

    सैर करो ख़ामोश रहो!

    गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं, इस बगिया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा

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