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सबको यहीं से सलाम किया!
किसका काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहराम, कूचे के उसके बाशिंदों ने सबको यहीं से सलाम किया| मीर तक़ी मीर
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हम को अबस बदनाम किया!
नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की, चाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया| मीर तक़ी मीर
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सुब्ह हुई आराम किया!
अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद, या’नी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया| मीर तक़ी मीर
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आख़िर काम तमाम किया!
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया, देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया| मीर तक़ी मीर
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इश्क़ का मारा जाने है!
क्या क्या फ़ित्ने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना, जिस बे-दिल बे-ताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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इस दर्द का चारा जाने है!
चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं, वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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बाग़ तो सारा जाने है!
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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बस्तियाँ!
हिन्दी के एक श्रेष्ठ रचनाकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| श्री रामदरश मिश्र जी ने साहित्य की सभी विधाओं में अपना योगदान किया है | उनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल– इस हाल…
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सैर करो ख़ामोश रहो!
गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं, इस बगिया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो| इब्न ए इंशा