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गुल-दान सजाऊँ किस के लिए!
अब शहर में उसका बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं, ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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मैं नाज़ उठाऊँ किसके लिए!
वो शहर में था तो उसके लिए औरों से भी मिलना पड़ता था, अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी
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अब ख़ाक उड़ाऊँ किसके लिए!
जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई, इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी
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मैं बाहर जाऊँ किसके लिए!
नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किसके लिए, वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी
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कब का तर्क इस्लाम किया!
‘मीर’ के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो, क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया| मीर तक़ी मीर
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रात को रो रो सुब्ह किया!
याँ के सपीद ओ सियह में हम को दख़्ल जो है सो इतना है, रात को रो रो सुब्ह किया या दिन को जूँ तूँ शाम किया| मीर तक़ी मीर
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दीदार को अपने आम किया!
काश अब बुर्क़ा मुँह से उठा दे वर्ना फिर क्या हासिल है, आँख मुँदे पर उन ने गो दीदार को अपने आम किया| मीर तक़ी मीर
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दूर से देखता हूँ– रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…
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पाँच दिन की छुट्टी!
एक बार फिर से इंटरनेट से पाँच दिन के लिए दूर जा रहा हूँ|आज के बाद अगली पोस्ट या ऑनलाइन गतिविधि 2 मार्च को ही होगी|