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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Mar 2023

    कुछ कहते कहते रह जाते हैं!

    हम भी दिल की बात कहाँ कह पाते हैं, आप भी कुछ कहते कहते रह जाते हैं| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    जाने हम कितने हो जाते हैं!

    बीते हुए दिन ख़ुद को जब दोहराते हैं, एक से जाने हम कितने हो जाते हैं| वसीम बरेलवी

  • 16th Mar 2023

    आओ हम धूप-वॄक्ष काटें!

    हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| श्री माहेश्वर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – आओ हम धूप-वॄक्ष काटें ।इधर-उधर हलकापन बाँटें । अमलतास गहराकर फूलेहवा नीमगाछों पर…

  • 15th Mar 2023

    आइए ज़हर पी के देखते हैं!

    पानियों से तो प्यास बुझती नहीं, आइए ज़हर पी के देखते हैं| राहत इंदौरी

  • 15th Mar 2023

    छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं!

    धूप इतनी कराहती क्यूँ है, छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं| राहत इंदौरी

  • 15th Mar 2023

    क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं!

    रोज़ हम इक अँधेरी धुंद के पार, क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं| राहत इंदौरी

  • 15th Mar 2023

    ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं!

    नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है, ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं| राहत इंदौरी

  • 15th Mar 2023

    कुछ रोज़ जी के देखते हैं!

    हौसले ज़िंदगी के देखते हैं, चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं| राहत इंदौरी

  • 15th Mar 2023

    घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है!

    घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया, घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है| राहत इंदौरी

  • 15th Mar 2023

    मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं!

    वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं, जिन लोगों के पास सवारी रहती है| राहत इंदौरी

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