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आओ हम धूप-वॄक्ष काटें!
हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| श्री माहेश्वर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – आओ हम धूप-वॄक्ष काटें ।इधर-उधर हलकापन बाँटें । अमलतास गहराकर फूलेहवा नीमगाछों पर…
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छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं!
धूप इतनी कराहती क्यूँ है, छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं| राहत इंदौरी
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क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं!
रोज़ हम इक अँधेरी धुंद के पार, क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं| राहत इंदौरी
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ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं!
नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है, ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं| राहत इंदौरी
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घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है!
घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया, घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है| राहत इंदौरी
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मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं!
वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं, जिन लोगों के पास सवारी रहती है| राहत इंदौरी