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उसने यह निर्णय क्यों लिया – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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कोई और रात-रानी में!
चमकता रहता है सूरज-मुखी में कोई और. महक रहा है कोई और रात-रानी में| राहत इंदौरी
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हिसाब कौन रखे!
अब इतनी सारी शबों का हिसाब कौन रखे, बड़े सवाब* कमाए गए जवानी में| *फल (कर्मों के) राहत इंदौरी
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तुम्हारा ज़िक्र नहीं है!
ये कोई और ही किरदार है तुम्हारी तरह, तुम्हारा ज़िक्र नहीं है मिरी कहानी में| राहत इंदौरी
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नदी ने धूप से क्या!
नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में, उजाले पाँव पटकने लगे हैं पानी में| राहत इंदौरी
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दिए पलकों पे रक्खे थे!
सहर तक तुम जो आ जाते तो मंज़र देख सकते थे, दिए पलकों पे रक्खे थे शिकन बिस्तर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी
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सागर तट!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी में कवियों के कवि कहलाने वाले स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता – यह समन्दर की पछाड़ तोड़ती है…
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हमें वो दिन दिखाए थे!
इन्हीं साँसों के चक्कर ने हमें वो दिन दिखाए थे, हमारे पाँव की मिट्टी हमारे सर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी
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मैं अपना अज़्म लेकर!
मैं अपना अज़्म* लेकर मंज़िलों की सम्त निकला था, मशक़्क़त हाथ पे रक्खी थी क़िस्मत घर पे रक्खी थी| *संकल्प राहत इंदौरी
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तुम्हारी याद थी जो!
हमारे ख़्वाब तो शहरों की सड़कों पर भटकते थे, तुम्हारी याद थी जो रात भर बिस्तर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी