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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Sep 2023

    बस्ती बचाने वालों में!

    जो पेश पेश थे बस्ती बचाने वालों में, लगी जब आग तो अपना भी घर बचा न सके| वसीम बरेलवी

  • 19th Sep 2023

    रास्ता दिखा न सके!

    फिर आँधियों ने सिखाया वहाँ सफ़र का हुनर, जहाँ चराग़ हमें रास्ता दिखा न सके| वसीम बरेलवी

  • 19th Sep 2023

    वास्ते निभा न सके!

    हम आँसुओं की तरह वास्ते निभा न सके, रहे जिन आँखों में उन में ही घर बना न सके| वसीम बरेलवी

  • 19th Sep 2023

    मसअला बना न सके!

    हम अपने आप को इक मसअला बना न सके, इसीलिए तो किसी की नज़र में आ न सके| वसीम बरेलवी

  • 19th Sep 2023

    ऐसे में कोई क्या निकले

    तमाम शहर की आँखों में सुर्ख़ शो‘ले हैं, ‘वसीम’ घर से अब ऐसे में कोई क्या निकले| वसीम बरेलवी

  • 19th Sep 2023

    तो फ़ासला निकले!

    जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है, उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले| वसीम बरेलवी

  • 19th Sep 2023

    स्वाधीनता के साधना पीठ!

    आज एक बार फिर मैं हमारे पूर्व प्रधान मंत्री, एक श्रेष्ठ नेता, प्रखर वक्ता और श्रेष्ठ कवि, भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| श्री वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता…

  • 18th Sep 2023

    जाने क्या निकले!

    मैं तुझ से मिलता तो तफ़्सील में नहीं जाता, मिरी तरफ़ से तिरे दिल में जाने क्या निकले| वसीम बरेलवी

  • 18th Sep 2023

    किताब-ए-माज़ी के!

    किताब-ए-माज़ी के औराक़ उलट के देख ज़रा, न जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले| वसीम बरेलवी

  • 18th Sep 2023

    मैं चाहता भी यही था!

    उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले, मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले| वसीम बरेलवी

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