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पुरानी शराब पीता हूँ!
पुराने चाहने वालों की याद आने लगे, इसीलिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ| हसरत जयपुरी
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मोर्जिम प्रवास!
गोवा में रहते हुए 6-7 साल हो गए, बहुत सी ‘बीच’ यहाँ की एक-एक करके देख ली हैं, लेकिन अभी भी बहुत सी ऐसी होंगी जिनको नहीं देखा होगा| शायद बहुत लंबे समय तक यहाँ रहने के बाद भी दावा करना मुश्किल हो किसी के लिए कि उसने सभी बीच देख ली हैं| चारों तरफ…
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पहचानने में देर लगे!
उसे भी देखूँ तो पहचानने में देर लगे, कभी कभी तो मैं इतनी शराब पीता हूँ| हसरत जयपुरी
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कितनी शराब पीता हूँ!
मुझे नशे में बहकते कभी नहीं देखा, वो जानता है मैं कितनी शराब पीता हूँ| हसरत जयपुरी
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महँगी शराब पीता हूँ!
मैं उसकी आँखों से छलकी शराब पीता हूँ, ग़रीब हो के भी महँगी शराब पीता हूँ| हसरत जयपुरी
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ए’तिबार आ न सके!
तसल्लियों पे बहुत दिन जिया नहीं जाता, कुछ ऐसा हो के तिरा ए’तिबार आ न सके| वसीम बरेलवी
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चलो, चलें चम्पागढ़!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत विधा के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ठाकुर प्रसाद सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – चलो, चलें चम्पागढ़–सपनों के देशप्यारे…