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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Sep 2023

    हवा महकी महकी!

    ये कौन आ गई दिल-रुबा महकी महकी, फ़ज़ा महकी महकी हवा महकी महकी| हसरत जयपुरी

  • 21st Sep 2023

    पुरानी शराब पीता हूँ!

    पुराने चाहने वालों की याद आने लगे, इसीलिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ| हसरत जयपुरी

  • 21st Sep 2023

    मोर्जिम प्रवास!

    गोवा में रहते हुए 6-7 साल हो गए, बहुत सी ‘बीच’ यहाँ की एक-एक करके देख ली हैं, लेकिन अभी भी बहुत सी ऐसी होंगी जिनको नहीं देखा होगा| शायद बहुत लंबे समय तक यहाँ रहने के बाद भी दावा करना मुश्किल हो किसी के लिए कि उसने सभी बीच देख ली हैं| चारों तरफ…

  • 20th Sep 2023

    पहचानने में देर लगे!

    उसे भी देखूँ तो पहचानने में देर लगे, कभी कभी तो मैं इतनी शराब पीता हूँ| हसरत जयपुरी

  • 20th Sep 2023

    कितनी शराब पीता हूँ!

    मुझे नशे में बहकते कभी नहीं देखा, वो जानता है मैं कितनी शराब पीता हूँ| हसरत जयपुरी

  • 20th Sep 2023

    महँगी शराब पीता हूँ!

    मैं उसकी आँखों से छलकी शराब पीता हूँ, ग़रीब हो के भी महँगी शराब पीता हूँ| हसरत जयपुरी

  • 20th Sep 2023

    ए’तिबार आ न सके!

    तसल्लियों पे बहुत दिन जिया नहीं जाता, कुछ ऐसा हो के तिरा ए’तिबार आ न सके| वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2023

    बस यही हासिल!

    तमाम उम्र की कोशिश का बस यही हासिल, किसी को अपने मुताबिक़ कोई बना न सके| वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2023

    ऐसी जगह उसे रखना!

    मिरे ख़ुदा किसी ऐसी जगह उसे रखना, जहाँ कोई मिरे बारे में कुछ बता न सके| वसीम बरेलवी

  • 20th Sep 2023

    चलो, चलें चम्पागढ़!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत विधा के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ठाकुर प्रसाद सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – चलो, चलें चम्पागढ़–सपनों के देशप्यारे…

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