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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Sep 2023

    ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी!

    तुम्हारे नाम पर मैंने हर आफ़त सर पे रक्खी थी, नज़र शो’लों पे रक्खी थी ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी

  • 15th Sep 2023

    चाँदनी का बिस्तर हो!

    ये क्या कि रोज़ वही चाँदनी का बिस्तर हो, कभी तो धूप की चादर बिछा के सो लेते|    बशीर बद्र

  • 15th Sep 2023

    इस तरफ़ भी हो लेते!

    तुम्हारी राह में शाख़ों पे फूल सूख गए, कभी हवा की तरह इस तरफ़ भी हो लेते| बशीर बद्र

  • 15th Sep 2023

    उन्ही पत्थरों पे सो लेते!

    अगर सफ़र में हमारा भी हम-सफ़र होता, बड़ी ख़ुशी से उन्ही पत्थरों पे सो लेते| बशीर बद्र

  • 15th Sep 2023

    इच्छा शक्ति!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के कुशल व्यंग्यकार, प्रतिष्ठित कवि और मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – ओ ठोकर !तू सोच रहीमैं…

  • 14th Sep 2023

    उससे लिपट के रो लेते

    दुखों का बोझ अकेले नहीं सँभलता है, कहीं वो मिलता तो उससे लिपट के रो लेते| बशीर बद्र

  • 14th Sep 2023

    तन्हाइयों में रो लेते!

    किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते, उदास रात की तन्हाइयों में रो लेते| बशीर बद्र

  • 14th Sep 2023

    लकीरों से नहीं उलझा!

    कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा, मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है| बशीर बद्र

  • 14th Sep 2023

    तहरीरों को पढ़ लेना!

    अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना, हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है| बशीर बद्र

  • 14th Sep 2023

    हवा से पूछना!

    तुम्हारे शहर के सारे दिए तो सो गए कब के, हवा से पूछना दहलीज़ पे ये कौन जलता है| बशीर बद्र

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